ढाई आखर पढ़े सो पंडित होय..... {1}
कबीर कहते हैं "ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होए" ।
अब पंडित का सनातनी अर्थ है - चारो वेदों का ज्ञाता, छहो दर्शनों का मर्मज्ञ । सरल शब्दो में कहे तो जो व्यक्ति ज्ञानी है वही पंडित है । फिर केवल ढाई अक्षर पढ़ लेने से कोई भला पंडित कैसे हो जाएगा? लेकिन यदि कबीर कह रहे हैं, तो इसके पीछे कोई रहस्य अवश्य ही होगा ।
अब हम जरा ज्ञान चक्षुओं को खोल के देखे तो पाएंगे की चारो वेदों में एक ही बात कही गयी है कि समस्त संसार ईश्वरमय है , और ईश्वर को प्राप्त करना प्राणी मात्र का धर्म ।
अर्थात प्रेम करो .... ईश्वर से.... ईश्वर के लोगों से । जिसके इतनी सी बात समझ आ गयी समझो हो गया पंडित ।
लेकिन इन ढाई अक्षरों को समझना इतना सरल कार्य नहीं है । यदि होता तो सब पंडित ही न हो जाते । कहते हैं कि जहाँ ज्ञान और तर्क का अतिरेक होता है वहाँ प्रेम नहीं टिकता । लेकिन मेरे मतानुसार जिसको प्रेम का ज्ञान हो जाए उसको किसी और ज्ञान की क्या आवश्यकता , और रही बात तर्क की तो प्रेम स्वयं मे अकाट्य है इसको कोई तर्क काट ही नही सकता ।
कुल मिलाकर प्रेम दर्शन का विषय है या ये कहें कि प्रेम स्वयं में एक दर्शन है ।
दर्शन दृष्टिकोण पर निर्भर करता है और दृष्टिकोण आपकी दृष्टि पर , अब दृष्टि भौतिक है या अलौकिक यह तो द्रष्टा ही जान सकता है । खैर!.... मुख्य बात यह है कि दृष्टि आकर्षण का मूल है और आकर्षण अधिकाँश सुंदर बस्तु की ओर ही होता है । और प्रेम भी । इस संसार में ईश्वर से भी ज्यादा कुछ सुंदर है? नहीं न! अर्थात प्रेम दैवीय चेस्टा है । और यही तो सभी धर्मग्रन्थो का सार है ।
तो फिर हुआ न ढाई अक्षर पढ़ने बाला पंडित ।
_______ © ✍️ "राज मोहन पाठक"
अब पंडित का सनातनी अर्थ है - चारो वेदों का ज्ञाता, छहो दर्शनों का मर्मज्ञ । सरल शब्दो में कहे तो जो व्यक्ति ज्ञानी है वही पंडित है । फिर केवल ढाई अक्षर पढ़ लेने से कोई भला पंडित कैसे हो जाएगा? लेकिन यदि कबीर कह रहे हैं, तो इसके पीछे कोई रहस्य अवश्य ही होगा ।
अब हम जरा ज्ञान चक्षुओं को खोल के देखे तो पाएंगे की चारो वेदों में एक ही बात कही गयी है कि समस्त संसार ईश्वरमय है , और ईश्वर को प्राप्त करना प्राणी मात्र का धर्म ।
अर्थात प्रेम करो .... ईश्वर से.... ईश्वर के लोगों से । जिसके इतनी सी बात समझ आ गयी समझो हो गया पंडित ।
लेकिन इन ढाई अक्षरों को समझना इतना सरल कार्य नहीं है । यदि होता तो सब पंडित ही न हो जाते । कहते हैं कि जहाँ ज्ञान और तर्क का अतिरेक होता है वहाँ प्रेम नहीं टिकता । लेकिन मेरे मतानुसार जिसको प्रेम का ज्ञान हो जाए उसको किसी और ज्ञान की क्या आवश्यकता , और रही बात तर्क की तो प्रेम स्वयं मे अकाट्य है इसको कोई तर्क काट ही नही सकता ।
कुल मिलाकर प्रेम दर्शन का विषय है या ये कहें कि प्रेम स्वयं में एक दर्शन है ।
दर्शन दृष्टिकोण पर निर्भर करता है और दृष्टिकोण आपकी दृष्टि पर , अब दृष्टि भौतिक है या अलौकिक यह तो द्रष्टा ही जान सकता है । खैर!.... मुख्य बात यह है कि दृष्टि आकर्षण का मूल है और आकर्षण अधिकाँश सुंदर बस्तु की ओर ही होता है । और प्रेम भी । इस संसार में ईश्वर से भी ज्यादा कुछ सुंदर है? नहीं न! अर्थात प्रेम दैवीय चेस्टा है । और यही तो सभी धर्मग्रन्थो का सार है ।
तो फिर हुआ न ढाई अक्षर पढ़ने बाला पंडित ।
( लिखने को तो बहुत कुछ है किन्तु एक साथ इतना पढ़ना आप के लिए उबाऊ भी हो सकता है अतः शेष अगले अंक में। यदि आप अगला अंक चाहते हैं तो कृपया कमेंट जरूर करें ) धन्यवाद!
_______ © ✍️ "राज मोहन पाठक"

बहुत बढ़िया राजमोहन भाई
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Deleteबहुत सुंदर भाई
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