श्रद्धा प्रेम और भक्ति...
पिछले अंक में हमने चर्चा की थी की प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ने बाला पण्डित कैसे हो सकता है, और प्रेम के दर्शन होने तथा दर्शन के दृष्टिकोण पर। अब आगे...... यह तो अटल सत्य है की जब तक आप किसी को भौतिक या अलौकिक दृष्टि से देखेंगे नही; आप का उससे प्रेम करना असम्भव होगा। किन्तु प्रेम के लिए केवल दृष्टि ही आवश्यक नहीं है, दृष्टि से प्रेम तक पहुंचने के लिए एक अवस्था से और गुजरना पड़ता है जिसे 'श्रद्धा' कहते हैं। श्रद्धा ही प्रेम की पहली सीढ़ी है। जब तक आप किसी के प्रति सश्रद्ध नहीं होंगे, आप प्रेम की अट्टालिका पर नहीं पहुँच सकते। और यदि पहुंच भी गए तो अधिक देर तक टिकना मुश्किल हो जाएगा। जहां पर श्रद्धा का नाम आता है वहां से आकांक्षाओ का उन्मूलन हो जाता है। और जहां अपकी सब इक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं, वही तो है निष्काम प्रेम । हम जिससे प्रेम करते हैं उसको देने के लिए तो हमारे पास बहुत कुछ होता है लेकिन उससे किसी चीज़ की इक्षा नही होती । यहां तक की बदले में प्रेम की भी नहीं। क्योंकि किसी वस्तु के बदले में किसी वस्तु की इक्षा करना तो सौदागरी है , प्रेम थोड़ी न! ...