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श्रद्धा प्रेम और भक्ति...

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पिछले अंक में हमने चर्चा की थी की प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ने बाला पण्डित कैसे हो सकता है, और प्रेम के दर्शन होने तथा दर्शन के दृष्टिकोण पर। अब आगे...... यह तो अटल सत्य है की जब तक आप किसी को भौतिक या अलौकिक दृष्टि से देखेंगे नही; आप का उससे प्रेम करना असम्भव होगा। किन्तु प्रेम के लिए केवल दृष्टि ही आवश्यक नहीं है, दृष्टि से प्रेम तक पहुंचने के लिए एक अवस्था से और गुजरना पड़ता है जिसे 'श्रद्धा' कहते हैं। श्रद्धा ही प्रेम की पहली सीढ़ी है। जब तक आप किसी के प्रति सश्रद्ध नहीं होंगे, आप  प्रेम की अट्टालिका पर नहीं पहुँच सकते। और यदि पहुंच भी गए तो अधिक देर तक टिकना मुश्किल हो जाएगा।    जहां पर श्रद्धा का नाम आता है वहां से आकांक्षाओ का उन्मूलन हो जाता है। और जहां अपकी सब इक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं,   वही तो है निष्काम प्रेम । हम जिससे प्रेम करते हैं उसको देने के लिए तो हमारे पास बहुत कुछ होता है लेकिन उससे किसी चीज़ की इक्षा नही होती । यहां तक की  बदले में प्रेम की भी नहीं। क्योंकि किसी वस्तु के बदले में किसी वस्तु की इक्षा करना तो सौदागरी है , प्रेम थोड़ी न!   ...

ढाई आखर पढ़े सो पंडित होय..... {1}

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कबीर कहते हैं "ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होए" । अब पंडित का सनातनी अर्थ है - चारो वेदों का ज्ञाता, छहो दर्शनों का मर्मज्ञ । सरल शब्दो में कहे तो जो व्यक्ति ज्ञानी है वही पंडित है । फिर केवल ढाई  अक्षर पढ़ लेने से कोई भला पंडित कैसे हो जाएगा? लेकिन यदि कबीर कह रहे हैं, तो इसके पीछे कोई रहस्य अवश्य ही होगा । अब हम जरा ज्ञान चक्षुओं को खोल के देखे तो पाएंगे की चारो वेदों में एक ही बात कही गयी है कि समस्त संसार ईश्वरमय है , और ईश्वर को प्राप्त करना प्राणी मात्र का धर्म । अर्थात प्रेम करो .... ईश्वर से.... ईश्वर के लोगों से । जिसके इतनी सी बात समझ आ गयी समझो हो गया पंडित । लेकिन इन ढाई अक्षरों को समझना इतना सरल कार्य नहीं है । यदि होता तो सब पंडित ही न हो जाते । कहते हैं कि जहाँ ज्ञान और तर्क का अतिरेक होता है वहाँ प्रेम नहीं टिकता । लेकिन मेरे मतानुसार जिसको प्रेम का ज्ञान हो जाए उसको किसी और ज्ञान की क्या आवश्यकता , और रही बात तर्क की तो प्रेम स्वयं मे अकाट्य है इसको कोई तर्क काट ही नही सकता । कुल मिलाकर प्रेम दर्शन का विषय है या ये कहें कि प्रेम स्वयं में एक दर्शन है ...

सभ्यता :- दो कदम और...

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यदि पाश्चात्य इतिहासकारो और पुरातत्वविदों की बात की जाए तो मनुष्य का विकास वानरों से हुआ है। मनुष्य अपनी आदिम अवस्था मे वानर था, और निरंकुशता पूर्वक जंगलो में घूमता था । और घूमता भी क्यों न, आखिर नगरीय सभ्यता का विकास हुआ तो मनुष्यो से ही है । और जब मनुष्य  स्वयं ही वानर था तो जंगलो में ही रहेगा न। यदि मैं अपनी व्यक्तिगत बात करूँ तो मुझको उपर्युक्त बात से कोई भी सरोकार नहीं है। क्योकि मैं पूर्ण रूपेण आस्तिक व्यक्ति हूँ और वेदों में, श्री भगवत गीता में अगाध विश्वास रखता हूँ । खैर मैं यहां पर इस बात में कतई उलझना नहीं चाहता कि कौन सत्य है और कौन असत्य । यह लेख लिखने का मेरा उद्देश्य कुछ और ही है । किन्तु यह तो विल्कुल सत्य है कि मनुष्य की आदिम अवस्था जो भी रही हो, वो उस समय निरा असभ्य और अशिक्षित था। जैसे जैसे समय बीतता गया , अनुभवों के आधार पर मनुष्य में शिक्षा और सभ्यता का स्तर बढ़ता गया ।        इस दृष्टि से   वर्तमान में हम जो समाज देखते हैं और अपने चारो ओर जिस वातावरण  का अनुभव करते हैं वह पूर्णता सभ्य होना चाहिए। क्योंकि कई हजार बर्षो से निरन्त...

शिक्षा और संस्कृति

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जब आज पूरे देश में जगह जगह राम लीला का मंचन हो रहा है , तब यह घटना और भी प्रासंगिक हो जाती है ।      अभी कुछ ही समय पहले देश के एक प्रतिष्टित टी वी चैनल पर , एक लोकप्रिय कार्यक्रम में जब देश की जानी मानी        अभिनेत्री से यह प्रश्न पूछा गया कि, "हनुमान जी संजीवनी बूटी किसके प्राण बचाने के लिए लाये थे?" तब वे निरुत्तर         हो गयीं। इस पर सोशल मीडिया पर उनके लिए खूब खरी खोटी कही गयी । खूब ताने कसे गए।       चिंतनीय बिषय ये है कि इसमे त्रुटि किसकी थी, उस अभिनेत्री की या उसको मिली शिक्षा की। दोस्तो आज हम इसी बिषय पर चिंतन करेंगे ।     शिक्षा और संस्कृति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । किसी एक के अभाव में दूसरा निरर्थक है । जिस प्रकार साइकिल के       दोनों पहिये मिलकर साइकिल को आगे बढ़ाते हैं और यदि एक पहिया निकाल दिया जाए तो दूसरा पहिया किसी काम      का नहीं रह जाता , ठीक उसी प्रकार शिक्षा और संस्कृति के सहारे से ही हमारा समाज विकास करते हुए आगे बढ़ता       ...

जिम्मेदारी का बस्ता भारी....

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 ना जाने किस कोने में बैठी सिसक रही किलकारी ।  बचपन के कंधों पर जिम्मेदारी का बस्ता भारी ।। नन्हीं  नन्हीं  आंखों में    बहुत  बड़े  ढेरों  स्वप्न पले । खेल खिलौने वाली उम्र बीत रही कल के बोझ तले । दोष किसी का क्या इसमें सब इसी समय की बलिहारी ||1|| इस बार परीक्षा में अंक अधिक कैसे भी लाना है ।  तैयारी की खातिर फिर उसको बाहर भी जाना है ।  रिश्तेदार सभी  कहते बनना है तुमको अधिकारी ||2|| अम्मा  को  साड़ी  बाबू  जी  को  जूते   दिलवाएंगे । इक अच्छे से घर में फिर मुनिया का ब्याह रचाएंगे । शेष बच गया यदि कुछ तो फिर आएगी अपनी बारी ||3||            ©®       ______________✍️ राज मोहन पाठक