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Showing posts from October, 2019

सभ्यता :- दो कदम और...

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यदि पाश्चात्य इतिहासकारो और पुरातत्वविदों की बात की जाए तो मनुष्य का विकास वानरों से हुआ है। मनुष्य अपनी आदिम अवस्था मे वानर था, और निरंकुशता पूर्वक जंगलो में घूमता था । और घूमता भी क्यों न, आखिर नगरीय सभ्यता का विकास हुआ तो मनुष्यो से ही है । और जब मनुष्य  स्वयं ही वानर था तो जंगलो में ही रहेगा न। यदि मैं अपनी व्यक्तिगत बात करूँ तो मुझको उपर्युक्त बात से कोई भी सरोकार नहीं है। क्योकि मैं पूर्ण रूपेण आस्तिक व्यक्ति हूँ और वेदों में, श्री भगवत गीता में अगाध विश्वास रखता हूँ । खैर मैं यहां पर इस बात में कतई उलझना नहीं चाहता कि कौन सत्य है और कौन असत्य । यह लेख लिखने का मेरा उद्देश्य कुछ और ही है । किन्तु यह तो विल्कुल सत्य है कि मनुष्य की आदिम अवस्था जो भी रही हो, वो उस समय निरा असभ्य और अशिक्षित था। जैसे जैसे समय बीतता गया , अनुभवों के आधार पर मनुष्य में शिक्षा और सभ्यता का स्तर बढ़ता गया ।        इस दृष्टि से   वर्तमान में हम जो समाज देखते हैं और अपने चारो ओर जिस वातावरण  का अनुभव करते हैं वह पूर्णता सभ्य होना चाहिए। क्योंकि कई हजार बर्षो से निरन्त...

शिक्षा और संस्कृति

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जब आज पूरे देश में जगह जगह राम लीला का मंचन हो रहा है , तब यह घटना और भी प्रासंगिक हो जाती है ।      अभी कुछ ही समय पहले देश के एक प्रतिष्टित टी वी चैनल पर , एक लोकप्रिय कार्यक्रम में जब देश की जानी मानी        अभिनेत्री से यह प्रश्न पूछा गया कि, "हनुमान जी संजीवनी बूटी किसके प्राण बचाने के लिए लाये थे?" तब वे निरुत्तर         हो गयीं। इस पर सोशल मीडिया पर उनके लिए खूब खरी खोटी कही गयी । खूब ताने कसे गए।       चिंतनीय बिषय ये है कि इसमे त्रुटि किसकी थी, उस अभिनेत्री की या उसको मिली शिक्षा की। दोस्तो आज हम इसी बिषय पर चिंतन करेंगे ।     शिक्षा और संस्कृति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । किसी एक के अभाव में दूसरा निरर्थक है । जिस प्रकार साइकिल के       दोनों पहिये मिलकर साइकिल को आगे बढ़ाते हैं और यदि एक पहिया निकाल दिया जाए तो दूसरा पहिया किसी काम      का नहीं रह जाता , ठीक उसी प्रकार शिक्षा और संस्कृति के सहारे से ही हमारा समाज विकास करते हुए आगे बढ़ता       ...

जिम्मेदारी का बस्ता भारी....

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 ना जाने किस कोने में बैठी सिसक रही किलकारी ।  बचपन के कंधों पर जिम्मेदारी का बस्ता भारी ।। नन्हीं  नन्हीं  आंखों में    बहुत  बड़े  ढेरों  स्वप्न पले । खेल खिलौने वाली उम्र बीत रही कल के बोझ तले । दोष किसी का क्या इसमें सब इसी समय की बलिहारी ||1|| इस बार परीक्षा में अंक अधिक कैसे भी लाना है ।  तैयारी की खातिर फिर उसको बाहर भी जाना है ।  रिश्तेदार सभी  कहते बनना है तुमको अधिकारी ||2|| अम्मा  को  साड़ी  बाबू  जी  को  जूते   दिलवाएंगे । इक अच्छे से घर में फिर मुनिया का ब्याह रचाएंगे । शेष बच गया यदि कुछ तो फिर आएगी अपनी बारी ||3||            ©®       ______________✍️ राज मोहन पाठक