जिम्मेदारी का बस्ता भारी....
ना जाने किस कोने में बैठी सिसक रही किलकारी ।
बचपन के कंधों पर जिम्मेदारी का बस्ता भारी ।।
नन्हीं नन्हीं आंखों में बहुत बड़े ढेरों स्वप्न पले ।
खेल खिलौने वाली उम्र बीत रही कल के बोझ तले ।
दोष किसी का क्या इसमें सब इसी समय की बलिहारी ||1||
इस बार परीक्षा में अंक अधिक कैसे भी लाना है ।
तैयारी की खातिर फिर उसको बाहर भी जाना है ।
रिश्तेदार सभी कहते बनना है तुमको अधिकारी ||2||
अम्मा को साड़ी बाबू जी को जूते दिलवाएंगे ।
इक अच्छे से घर में फिर मुनिया का ब्याह रचाएंगे ।
शेष बच गया यदि कुछ तो फिर आएगी अपनी बारी ||3||
बचपन के कंधों पर जिम्मेदारी का बस्ता भारी ।।
नन्हीं नन्हीं आंखों में बहुत बड़े ढेरों स्वप्न पले ।
खेल खिलौने वाली उम्र बीत रही कल के बोझ तले ।
दोष किसी का क्या इसमें सब इसी समय की बलिहारी ||1||
इस बार परीक्षा में अंक अधिक कैसे भी लाना है ।
तैयारी की खातिर फिर उसको बाहर भी जाना है ।
रिश्तेदार सभी कहते बनना है तुमको अधिकारी ||2||
अम्मा को साड़ी बाबू जी को जूते दिलवाएंगे ।
इक अच्छे से घर में फिर मुनिया का ब्याह रचाएंगे ।
शेष बच गया यदि कुछ तो फिर आएगी अपनी बारी ||3||

👍👍👍👍
ReplyDeleteबहुत सही पाठक जी
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