शिक्षा और संस्कृति
जब आज पूरे देश में जगह जगह राम लीला का मंचन हो रहा है , तब यह घटना और भी प्रासंगिक हो जाती है ।
अभी कुछ ही समय पहले देश के एक प्रतिष्टित टी वी चैनल पर , एक लोकप्रिय कार्यक्रम में जब देश की जानी मानी अभिनेत्री से यह प्रश्न पूछा गया कि, "हनुमान जी संजीवनी बूटी किसके प्राण बचाने के लिए लाये थे?" तब वे निरुत्तर हो गयीं। इस पर सोशल मीडिया पर उनके लिए खूब खरी खोटी कही गयी । खूब ताने कसे गए।
चिंतनीय बिषय ये है कि इसमे त्रुटि किसकी थी, उस अभिनेत्री की या उसको मिली शिक्षा की।
दोस्तो आज हम इसी बिषय पर चिंतन करेंगे ।
शिक्षा और संस्कृति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । किसी एक के अभाव में दूसरा निरर्थक है । जिस प्रकार साइकिल के दोनों पहिये मिलकर साइकिल को आगे बढ़ाते हैं और यदि एक पहिया निकाल दिया जाए तो दूसरा पहिया किसी काम का नहीं रह जाता , ठीक उसी प्रकार शिक्षा और संस्कृति के सहारे से ही हमारा समाज विकास करते हुए आगे बढ़ता है । यदि इसमे से किसी एक की भी कमी हुई तो समाज का विकास वहीं बाधित हो जाता है । शिक्षा संस्कृति को संस्कार देती है , और संस्कृति शिक्षा को व्यापकता ।
साथियो आज शिक्षा और संस्कृति में अलगाव होता जा रहा है । हमको शिक्षा तो दी जा रही है किन्तु वह हमारी संस्कृति से परे हटकर है । इसी का कारण है की आज के समाज में इतनी अराजकता फैलती जा रही है ।
जो शारीरिक रूप से कमजोर हो वह पुनः स्वस्थ हो सकता है । मानसिक कमजोरी का इलाज सम्भव है , आर्थिक रूप से कमजोर भी धनी बन सकता है । किन्तु यदि किसी की संस्कृति कमजोर हो गयी, किसी के संस्कार मैले हो गए तब उसका पतन निश्चित है ।
आइये एक प्रयास करते हैं , अपनी शिक्षा को अपने आदर्शो ; अपनी संस्कृति से जोड़ने का । जिससे की एक सम्रद्धिशाली , गौरवशाली और सुसंस्कृत भारत का निर्माण हो सके ।
______©® ✍️ राज मोहन पाठक
अभी कुछ ही समय पहले देश के एक प्रतिष्टित टी वी चैनल पर , एक लोकप्रिय कार्यक्रम में जब देश की जानी मानी अभिनेत्री से यह प्रश्न पूछा गया कि, "हनुमान जी संजीवनी बूटी किसके प्राण बचाने के लिए लाये थे?" तब वे निरुत्तर हो गयीं। इस पर सोशल मीडिया पर उनके लिए खूब खरी खोटी कही गयी । खूब ताने कसे गए।
चिंतनीय बिषय ये है कि इसमे त्रुटि किसकी थी, उस अभिनेत्री की या उसको मिली शिक्षा की।
दोस्तो आज हम इसी बिषय पर चिंतन करेंगे ।
शिक्षा और संस्कृति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । किसी एक के अभाव में दूसरा निरर्थक है । जिस प्रकार साइकिल के दोनों पहिये मिलकर साइकिल को आगे बढ़ाते हैं और यदि एक पहिया निकाल दिया जाए तो दूसरा पहिया किसी काम का नहीं रह जाता , ठीक उसी प्रकार शिक्षा और संस्कृति के सहारे से ही हमारा समाज विकास करते हुए आगे बढ़ता है । यदि इसमे से किसी एक की भी कमी हुई तो समाज का विकास वहीं बाधित हो जाता है । शिक्षा संस्कृति को संस्कार देती है , और संस्कृति शिक्षा को व्यापकता ।
साथियो आज शिक्षा और संस्कृति में अलगाव होता जा रहा है । हमको शिक्षा तो दी जा रही है किन्तु वह हमारी संस्कृति से परे हटकर है । इसी का कारण है की आज के समाज में इतनी अराजकता फैलती जा रही है ।
जो शारीरिक रूप से कमजोर हो वह पुनः स्वस्थ हो सकता है । मानसिक कमजोरी का इलाज सम्भव है , आर्थिक रूप से कमजोर भी धनी बन सकता है । किन्तु यदि किसी की संस्कृति कमजोर हो गयी, किसी के संस्कार मैले हो गए तब उसका पतन निश्चित है ।
आइये एक प्रयास करते हैं , अपनी शिक्षा को अपने आदर्शो ; अपनी संस्कृति से जोड़ने का । जिससे की एक सम्रद्धिशाली , गौरवशाली और सुसंस्कृत भारत का निर्माण हो सके ।
______©® ✍️ राज मोहन पाठक

We have to make aware people and tell the culture and civilization of India.
ReplyDeleteअच्छा लेख।
ReplyDeleteसुंदर लेख।हम अपने बच्चों को अपने धर्म की जानकारी दे ये हम सबका कर्तव्य है।
ReplyDeleteBahut sunder
ReplyDeleteआप सभी का बहुत बहुत आभार
ReplyDeleteशिक्षा संस्कृति और संस्कार, यही जीवन के तीन आधार
ReplyDelete।
मृदुल मयंक मिश्रा