सभ्यता :- दो कदम और...
यदि पाश्चात्य इतिहासकारो और पुरातत्वविदों की बात की जाए तो मनुष्य का विकास वानरों से हुआ है। मनुष्य अपनी आदिम अवस्था मे वानर था, और निरंकुशता पूर्वक जंगलो में घूमता था । और घूमता भी क्यों न, आखिर नगरीय सभ्यता का विकास हुआ तो मनुष्यो से ही है । और जब मनुष्य स्वयं ही वानर था तो जंगलो में ही रहेगा न।
यदि मैं अपनी व्यक्तिगत बात करूँ तो मुझको उपर्युक्त बात से कोई भी सरोकार नहीं है। क्योकि मैं पूर्ण रूपेण आस्तिक व्यक्ति हूँ और वेदों में, श्री भगवत गीता में अगाध विश्वास रखता हूँ ।
खैर मैं यहां पर इस बात में कतई उलझना नहीं चाहता कि कौन सत्य है और कौन असत्य । यह लेख लिखने का मेरा उद्देश्य कुछ और ही है ।
किन्तु यह तो विल्कुल सत्य है कि मनुष्य की आदिम अवस्था जो भी रही हो, वो उस समय निरा असभ्य और अशिक्षित था। जैसे जैसे समय बीतता गया , अनुभवों के आधार पर मनुष्य में शिक्षा और सभ्यता का स्तर बढ़ता गया ।
इस दृष्टि से वर्तमान में हम जो समाज देखते हैं और अपने चारो ओर जिस वातावरण का अनुभव करते हैं वह पूर्णता सभ्य होना चाहिए। क्योंकि कई हजार बर्षो से निरन्तर सभ्य होने का यह क्रम तो अब अपने उत्कर्ष पर होगा।
किन्तु क्या ऐसा है ?
क्या हम वर्तमान पीढ़ी को सभ्य कह सकते हैं ।
यदि हां तो वर्तमान में बृद्धाश्रमो की संख्या घटती क्यों नहीं।
क्यो लूटमार और आतंकवादी गतिविधियां निरन्तर वृद्धि पर हैं । क्यों पशुओं की तरह बीच चौराहे पर किसी निरीह पर व्यभिचार होता है ।
क्या सिर्फ ऊंची ऊंची इमारतों को खड़ा कर लेने से हम सभ्य हो जाएंगे । या फिर दूसरे गृहो की यात्रा हमारी सभ्यता की परिचायक होगी । यदि हम निरन्तर सभ्य होते जा रहे हैं तो हमारा नैतिक पतन क्यो हो रहा है ।
हम सब को मिलकर इन ज्वलन्त प्रश्नों के उत्तर की खोज करना ही होगा । क्योकि सिर्फ भौतिक रूप से सभ्य होना सभ्य नही मशीनीकरण कहलाता है , हमको अपनी नैतिकता का भी संस्कार करना होगा । तभी हम स्वयं को सभ्य कह पाएंगे । हमने स्वयं को भौतिक रूप से तो सभ्य कर लिया किन्तु नैतिक सभ्यता अभी शेष है । इसीलिये सभ्यता :- दो कदम और...........
✍️ "राज मोहन पाठक"
यदि मैं अपनी व्यक्तिगत बात करूँ तो मुझको उपर्युक्त बात से कोई भी सरोकार नहीं है। क्योकि मैं पूर्ण रूपेण आस्तिक व्यक्ति हूँ और वेदों में, श्री भगवत गीता में अगाध विश्वास रखता हूँ ।
खैर मैं यहां पर इस बात में कतई उलझना नहीं चाहता कि कौन सत्य है और कौन असत्य । यह लेख लिखने का मेरा उद्देश्य कुछ और ही है ।
किन्तु यह तो विल्कुल सत्य है कि मनुष्य की आदिम अवस्था जो भी रही हो, वो उस समय निरा असभ्य और अशिक्षित था। जैसे जैसे समय बीतता गया , अनुभवों के आधार पर मनुष्य में शिक्षा और सभ्यता का स्तर बढ़ता गया ।
इस दृष्टि से वर्तमान में हम जो समाज देखते हैं और अपने चारो ओर जिस वातावरण का अनुभव करते हैं वह पूर्णता सभ्य होना चाहिए। क्योंकि कई हजार बर्षो से निरन्तर सभ्य होने का यह क्रम तो अब अपने उत्कर्ष पर होगा।
किन्तु क्या ऐसा है ?
क्या हम वर्तमान पीढ़ी को सभ्य कह सकते हैं ।
यदि हां तो वर्तमान में बृद्धाश्रमो की संख्या घटती क्यों नहीं।
क्यो लूटमार और आतंकवादी गतिविधियां निरन्तर वृद्धि पर हैं । क्यों पशुओं की तरह बीच चौराहे पर किसी निरीह पर व्यभिचार होता है ।
क्या सिर्फ ऊंची ऊंची इमारतों को खड़ा कर लेने से हम सभ्य हो जाएंगे । या फिर दूसरे गृहो की यात्रा हमारी सभ्यता की परिचायक होगी । यदि हम निरन्तर सभ्य होते जा रहे हैं तो हमारा नैतिक पतन क्यो हो रहा है ।
हम सब को मिलकर इन ज्वलन्त प्रश्नों के उत्तर की खोज करना ही होगा । क्योकि सिर्फ भौतिक रूप से सभ्य होना सभ्य नही मशीनीकरण कहलाता है , हमको अपनी नैतिकता का भी संस्कार करना होगा । तभी हम स्वयं को सभ्य कह पाएंगे । हमने स्वयं को भौतिक रूप से तो सभ्य कर लिया किन्तु नैतिक सभ्यता अभी शेष है । इसीलिये सभ्यता :- दो कदम और...........
✍️ "राज मोहन पाठक"

वाह वाह...जारी रखो..भइया.
ReplyDelete👍👍
🙏🙏🙏
Deleteबढिया लेख
ReplyDelete🙏
Deleteबढिया लेख
ReplyDelete🙏🙏🙏
Deleteअच्छा लेख
ReplyDelete��
Delete🙏🙏🙏🙏