जिम्मेदारी का बस्ता भारी....

 ना जाने किस कोने में बैठी सिसक रही किलकारी ।
 बचपन के कंधों पर जिम्मेदारी का बस्ता भारी ।।

नन्हीं  नन्हीं  आंखों में    बहुत  बड़े  ढेरों  स्वप्न पले ।
खेल खिलौने वाली उम्र बीत रही कल के बोझ तले ।
दोष किसी का क्या इसमें सब इसी समय की बलिहारी ||1||

इस बार परीक्षा में अंक अधिक कैसे भी लाना है ।
 तैयारी की खातिर फिर उसको बाहर भी जाना है ।
 रिश्तेदार सभी  कहते बनना है तुमको अधिकारी ||2||

अम्मा  को  साड़ी  बाबू  जी  को  जूते   दिलवाएंगे ।
इक अच्छे से घर में फिर मुनिया का ब्याह रचाएंगे ।
शेष बच गया यदि कुछ तो फिर आएगी अपनी बारी ||3||


           ©®       ______________✍️ राज मोहन पाठक

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